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शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

मैं सार्वजनिक हो गया

बहुत दिन हुए
एक कविता नहीं लिखी
बहुत दिन हुए
एक कहानी नहीं पढ़ी
जब-जब प्रयास किया
कविता ने मुझे लिख दिया
और कहानी ने मुझे पढ़ लिया
अफसोस
मैं सार्वजनिक हो गया
सबके लिखने पढ़ने में
- राकेश कुमार श्रीवास्तव

बड़ा कठिन है एक भिखारी बनना

न चाहते हुए भी
दिख ही जाते हैं
भिखमंगे
खैरात में दे ही देते हैं लोग
दुआएं लाखों
अगर ये उनका ढोंग नहीं है
तो
बिना कठोर परिश्रम के
जैसे मुश्किल होता है एक ओहदा हासिल करना
स्नातक, स्नातकोत्तर होना
ऐसे ही कठिन होता होगा
एक भिखारी बनने में
-राकेश कुमार श्रीवास्तव

सीट पा लेने का सुख

घर पहुंचने की होड़ में
थके हारे काम से चूर...
डेली-पैसेंजरी करते लोग
ट्रेन कम्पार्टमेंट के दो सीटों की गैलरी में खड़े
ताक में रहते हैं
चेहरे पर उदासी लिये
कि कहीं कोई अगले स्टेशन पर उतरे
जिससे उन्हें भी छोटी सी राहत मिल सके
जो उनके लिये कहीं बड़ा है किसी
भी बड़े सुख या बड़ी कामना से
उस सीट को पा लेने में ही-
उस सीट को हासिल कर लेने में ही
अपने गंतव्य तक के लिये-
उनकी बड़ी सफलता है
वे लोग जब जगह पा लेते हैं
कोई आकर देखे
उनके मुख पर छा गये
कुछ पलों के लिये का वह सुख
वह राहत, वह खुशी
जोकि किसी नेता को
एक चुनाव जीतने के बादवाली
सीट को
हासिल करने में शायद ही हुई हो!
-राकेश कुमार श्रीवास्तव

कसौटी

जमीन खा जाती है
जमीर को
और जमीर?
कभी कभार
जमीर भी
खा जाता है जमीन को
मगर विडंबना!
कि जमीन ही
अधिकतर हावी रहती है
जमीर पर
जमीर का जमीन पर
हावी होना तो
सिर्फ एक घटना होती है
जो सिर्फ और सिर्फ
मिशाल बनकर ही रह जाती है
जिसे लोग
चरित्र में न ढालकर
केवल बच्चों के पढ़ाने के काम में लाते हैं!
- राकेश कुमार श्रीवास्तव

सुलझन

पहले तो जिंदगी को
उलझने मत दो
गर उलझ जाये...
क्या हुआ कि उसमें पड़ जाय गिट्ठा ही
उसे तोड़ो-सुलझाओ
फिर जोड़ो एक धागे की भांति
उसके बाद इतना पीछे हटो
बाकी बचे धागे को खोलते हुए--
कि धागे में पड़ा गिट्ठा
ओझल हो जाय आंखों से
विश्वास करो
बहुत समय बचा लोगे तुम!
- राकेश कुमार श्रीवास्तव

नाई दिलाता है याद

नाई दिलाता है याद
मुझे
मेरी मां की
मेरे पिता की
दीदी की
मेरे भईया की
....जब वह (नाई)
बड़ी तल्लीनता से
मेरी दाढ़ी बनाने के बाद
मेरा मुंह तौलिये से पोंछता है
ठीक उसी समय याद आती है मुझे
दीदी जो इसी प्रकार
मेरे स्कूल जाने के पहले
मेरे नहा लेने के बाद गमछे से मेरा
सर व मुंह पोंछती थी
जो दूर है और चली गयी है अपनी ससुराल
पिता की तो बात ही क्या
उन्होंने भी कोई कसर नहीं छोड़ी
अपनी नन्हें संतानों को
उनकी छोटी-छोटी जरुरतों की
कोई भी सेवा देने में
जो हमारे समय में आज
नहीं हैं वर्तमान
मां आज बीमार है
फिर भी कभी-कभी प्यार से पोंछ देती है वह मेरा मुंह और सर
या फिर मैं ही पोंछ लेता हूं कभी-कभी पसीने से तर-बतर
उसके आंचल से अपना मुंह
अपने कर्मप्रधान समय में वह भी दे चुकी हैं
अपनी हर संभव सेवा
सबसे बड़ी बात मां को नहीं पड़ती जरुरत
किसी भी तौलिये या गमछा या अंगोछे की
बीमार मां जो बमुश्किल ही उठ पाती है अपने बिस्तर से
अपनी आंचल से पोंछती है हमारा मुंह
और भर देती है हमें प्यार से

- राकेश कुमार श्रीवास्तव

हमारा अहंकार

परायों को ठुकराना आसान है..
क्योंकि उनसे हमारा 
खुन का रिश्ता नहीं है..
वहां हमारा अहंकार बड़ा होता है..
ठुकराये गये अपनों को अपनाना बड़ा ही कठिन..
चाहते हुए भी नहीं अपना पाना..
यहां भी एक ही वजह है..
हमारा अहंकार बड़ा होता है.

क्योंकि मां का कोई विकल्प नहीं है...

एक मां पर सौ पत्नी कुरबान...
पत्नी तो फिर भी मिल जाएगी
क्योंकि पत्नी का विकल्प है पर..
मां का विकल्प नहीं है..
तो फिर उन पत्नियों का क्या
जो एक मां भी हैं
और उन बच्चों का क्या ..
जो उन पत्नियों की संतानें हैं...
है कोई उनका विकल्प?
क्योंकि मां का कोई विकल्प नहीं है...

क्योंकि ठगिनी का तो उन पर एहसान था..

वो कहते रहे कि 
लोगों को समझने का ठेका
उन्होंने ही लिया था
कब्र तक पांव पहुंचे 
..तो पता चला
नज़रिया किसी और का था
चश्मा किसी और का
चश्मा जब तक उतरा
अफसोस के लिये
कोई घर नहीं बचा था
पश्चाताप करके भी होता क्या
न वो उदास सुनहरे पल ही बचे थे
न सताये गये लोग
बचा था तो सिर्फ
कंक्रीट का खंडहर
अब वो चाहकर भी
कुछ नहीं कर सकते
जिन्होंने उन्हें चुपके से
काला चश्मा पहना
सारी दुनिया काली दिखाने में हासिल कर ली थी सफलता
अव्वल तो उन्होंने उनके चश्मे में
एक सूई सी सुराख कर
हरी साड़ी में
उस सुराख से आती हुई
नज़रों को घेर
उनके लिये उम्मीद की एक नई किरण..
एक नई रश्मि बन अपने एहसानों का बोझ डाल दिया कि देख ले मुझे
उम्मीद की एकमात्र किरण तुम्हारे ईर्द गिर्द इस घनघोर स्वार्थी अंधकार में..
वो कहते रहे कि उनसे बड़ा न्यायकर्ता कोई नहीं..
वास्तव में वे थे भी..
उनसे कभी किसी पर अन्याय होता नहीं देखा गया..
उन्होंने कभी किसी पर अत्याचार नहीं किया..
पर शक्तिशाली तो वे थे ही..
और हाथी को कहां पता चलता है..
कि अंजाने में वह कितने चींटियों को मसलता जाता है
उन्होंने कभी जुल्म नहीं किये
जुल्म तो बस हो गये..
क्योंकि वो तो अपनी नज़रों से दुनिया को देखते थे..
पर ठगिनी
तो उनकी आंखों पर अपनी समझदारी का शीशा चढ़ाने में हो गयी थी कामयाब
वो बहुत न्यायप्रिय थे
पर कब वो बिना रिश्वत के ही
बिना दूसरे पक्ष को सुने एकतरफा फैसला देना शुऱू कर दिया था उन्हें पता नहीं था
जब तक पता चला वो ऐश्वरिक न्याय के घेरे में थे....और दूर एक पत्थर पर अपनी कामयाबी पर बैठकर वह ठगिनी अट्टहास
किये जा रही थी
मगर वो तो एहसानो में दबे हुए थे
मगर थे तो न्यायप्रिय!
सहर्ष सजा भुगतने को तैयार हो गये..
भगवान ने उन्हें स्वर्ग दिया पर एकांतवास का..
वो न्यायप्रिय थे..
वो न्यायप्रिय थे..
मगर एहसानों में दबे हुए
उन्हें पता नहीं चला कि
अपने नीचे जाने अंजाने कितनों को
कितने निरीह व बेकसुरों को दबा कर मार चुके हैं
अब तो कुछ नहीं हो सकता
शिवाय पछतावे के
क्योंकि ठगिनी का तो उन पर एहसान था....

जान को जान कहा तो...

जान को जान कहा तो 
जान लेने पर उतारू हो गयीं जान
वो नहीं जानती कि उनकी
उलझने खतम हुईं हैं मात्र
वो भी सिर्फ मेरी मर्जी से
उन्होंने समझा कि उन्होंने डरा दिया
पर उन्होंने नहीं समझा
उनकी खुशी में ही मेरी खुशी है
मैं हटा भी तो क्या हुआ
एक बार जान को जान ...कहा तो सही
अपने सच्चे मन की लय में बहा तो सही
अब तो जान ये शरीर बेजान है
ये तो बस अब आत्मा का परिधान है..
पर न ही मैं तंद्रील हूं और न ही लाश
और न ही मैं जीवन से हूं बदहवास
प्रश्न यह भी नहीं कि मुझे क्या चाहिये
न कोई जिज्ञासा आपसे न कोई खरास
प्रश्न है यहां सिर्फ आपकी खुशियों का
जहां भी रहें आप रहें खुश
पूरी हो आपकी हर मुराद...

किसी का दिल दुखाना नहीं सीखा

किसी को मुसीबत में छोड़कर आना नहीं सीखा
अपनी जरुरतों के लिये किसी को पटाना नहीं सीखा
लाख आये मुसीबत सही मेरे जीवन में यार
मैंने किसी का कभी दिल दुखाना नहीं सीखा

रोटी के सवाल पर प्यार

जब मैं फुरसत में था 
प्यार के सवाल पर
वे व्यस्त थीं रोटी के सवाल पर
जब उन्हें प्यार की फिकर हुई
रोटी के सवाल पर अफसोस कि मैं व्यस्त था
साप्ताहिक छुट्टी भी मिली
तो अलग-अलग
एक खुशनुमा दिन जिंदगी का
जब सबकी छुट्टी एक साथ हुई
सोचने में चला गया दिन
न वो मिली न हम मिले
ख्वाब परवान चढ़े
और सच्चाई के धरातल पर
आकर दम तोड़ दिये
शाम को ऩींद खुली, तो मां को भी शुकून में देखा
कि सोया ही सही
बेटा मेरा साथ है तो सही-
पास है तो सही
मैं सोचता रहा कि आज खायेंगे बिरयानी
एक साथ परी-केबिन में
जब नींद खुली तो मोबाइल पर
आया हुआ था एक मैसेज
.......आज रहने देते हैं
फिर कभी ..लूज मोशन है.....
और उनकी कोई बात आसानी से
नहीं माननेवाला मैं पता नहीं क्यों
बड़ी आसानी से मान गया था उनकी यह बात
मुझे पता था कि वह झूठ बोल रही हैं
न उन्होंने मुझे दुख पहुंचाने की कोशिश की
न मेरी औकात पर उठाया सवाल
उन्हें पता था मेरा हाल है बेहाल
पर ऐसा नहीं था कि उनके हाल से मैं नावाकिफ था
मुझे पता था उनकी भी औकात
अपनी परेशानी के साथ ही
उन्होंने भी परेशानी समझी मेरी
अभाव के जंगल में किसी को
प्यार का हक नहीं होता
और अभाव के जंगल में
प्यार नहीं होता.

हमें सही किसने ठहराया कि हम गलत होने से डरें

हम सही थे तो भी गलत 
और गलत तो गलत ही था
हमें सही किसने ठहराया
कि हम गलत होने से डरें

थोड़ी सी खुशियां 
बिटोरने की कोशिश की हमने
वरना दुनिया को क्या पड़ी है
राकेश जिये या मरे.

प्यार तो गूंगे भी करते हैं राकेश

बात से बात निकलती है
बातों से इत्तेफाक क्या
प्यार तो गूंगे भी करते हैं राकेश
वरना बातों में बात क्या

चाहत और पसंद

किसने कहा कि मैं
आपको पसंद करता हूं
पसंद तो बाजार में उपलब्ध 
चीजों को की जाती है

इससे भी आगे कुछ कहने की 
जरूरत है क्या राकेश ?
तो सुन ऐ मेरे हमनशीं
चाहत की कोई पसंद नहीं होती

अस्तित्व...



अस्तित्व
एक बहुत ही अर्थपूर्ण शब्द
शायद यही है
जिसे अब तक 
खोया है मैंने
बीमार विधवा माँ में
दरकते हुए सपनों
.. ...उजाड़...दिशाविहीन
उद्देश्यविहीन....
अंतहीन रास्तों में खोजता
अपनी और माँ की
स्मृति-विस्मृतियों में
पिता के साथ
बिताये गये क्षणों में
टटोलता
कई बार ही हुआ हूं
मैं अस्तित्वविहीन
जब-जब हुआ हूं
... .आहत...!
अस्तित्व का हो जाता है
.....एहसास-
पता चल जाता है
पानी के उस स्तर का
जहां पर मैं
खड़ा हुआ रहता हूं..

अमीर-गरीब

साल्टलेक
जाने के दौरान
उसदिन मुझे 
दस रुपये की सात पेन
महंगी लगी
जिस दिन मेरे पॉकेट में
मात्र दस रुपये ही थे
और किसी खरीददार को
दस-दस रुपये के नौ नोट
गिनकर लौटानेवाला
हॉकर मुझे वास्तव में
अमीर लग रहा था....

मेरी स्मृति

कॉलेज के दिनों में लिखी गई मेरी एक कविताः-



एक सुखद स्मृति..
छा गई है मेरे स्मृति-पटल पर
जो बाध्य करती है मुझे
अपनी छवि बनवाने की
... एक कोरे कागज पर।
चाहती है वह
मेरे स्मृति-पटल से निकल
वाह्यरुप धरने की
उसकी इस चाहत पर
मैं उसे आकंने का
करता हूं कई असफल प्रयास..
पर वह नहीं बनती
इस प्रयास में बन जाती हैं
नवीन आकृतियां
जिन्हें मैं जानता तक नहीं
जिन्हें शायद ही कोई पहचान सके
मैं कूढ़ जाता हूं
जब-जब ही मैं उसे आंकने बैठता हूं
वह या तो लजाती हुई,
या मुझसे ठिठोली करती हुई
मेरे अंतर में ही
विलीन हो जाती है कहीं
कैसे बनाऊं मैं उसे
जब उसे विलुप्त ही हो जाना है
प्रकृति-प्रदत्त हुनर तो पाया नहीं मैंने,
कोई भी चित्र खींच दूं फटाफट
एक चित्रकार की भांति
बहरहाल,
मैं उसे अपनी विस्मृतियों में
ढूंढता रह जाता हूं
अंततः मैं झूंझलाकर फेंक देता हूं
पैंसिल और कागज..
और तब विलीन हुई यही स्मृति..
फिर मेरे सामने खड़ी हो
खिलखिलाती हुई सी प्रतीत होती है
इससे लगता है मुझे चिढ़ाती है वह
लेकिन ओ स्मृति!
तेरी इन उच्छृंखलताओं से
क्या मैं चिढ़ जाऊंगा
तुम्हारा चिढ़ाना और मुझ पर हंसना
शायद मुझे अच्छा लगता है
तभी तो मैंने तय किया है
अब तुम्हारी छवि नहीं बनाऊंगा
अब तो मैं बनाऊंगा
अनजानी, अनसोची, आकृतियां
ताकि कभी इत्तेफाक हो
और उन आकृतियों को बनाते-बनाते
मेरी स्मृति में खेल रही तू
तेरी प्यारी सी छवि बन जाय
और मुझे तुम्हारा वाह्याकार मिल जाय !

धुंआ सा संसार राकेश

धुंआ सा संसार राकेश
धुंआ में कुछ बात!
पिये धुंआ या न पिये 
धुंआ सब बन जात!!

कौन कर्मरत, किसे गर्व अपने कर्म पर!

अनिमेष..
चल रही है रैना 
कभी तो होता है संदेह 
कि घड़ी चलती है
या काल-
या फिर सूर्य कि चंद्रमा
मुझे तो शाश्‍वत..
वर्तमान दीखता है
सुबह उठा..
...वर्तमान...!?
रात हुआ..
वर्तमान
और अभी?
वर्तमान
तुम कहते हो
मैं पंगु हो गया हूं?
कर्महीन, गतिहीन
..निस्तेज पड़ा!
ऐसा कैसे
कह सकते हो तुम?
फिर मेरी यह चमड़ी
बूढ़ाs कैसे रही है?
दृष्टिभ्रम हो गया है
जो तुम्हें चल-अचल
और अचल-चल
महसुस होता है..
अरे भई!
कोई कर्म करे
या न करे
उसका कर्म तो-
हो ही जाता है
उनकी प्रकृति
उनका कर्म कर देती है
पर तुम्हें अपने कर्म करने पर
इतना गर्व क्यों है?
मैंने देखा है-
उस कर्मरत छात्र को-
सुना होगा शायद तुमने भी
जो खुशी से झूमते हुए
लाता है खबर
परीक्षा में पास होने का..
और दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है
सरेआम-सरेराह!
दर्शक देखते हैं
...क्षत-विक्षत शरीर
...और...और..
मुचड़ी हुई
रिजल्ट...!
कितने ही हैं
जिनका जीवन
कट जाता है
खाते कमाते..
कर्मरत तो सभी हैं
अंतर सिर्फ इतने का है
कि-
कोई रोटी कमाता है
कोई सहेजता है
कोई बांटता है
और कोई
रोटी कमाने का नया-नया
तरीका ईजाद करता है
लेकिन ऐसा भी क्या ..
आखिर में तो
प्रकृति द्वारा क्रियान्वित
एक ही कर्म के नेपथ्य में
सभी समा जाते हैं...
सभी को समा जाना है..
क्यों;
हम कर्महीनों को हमारी प्रकृति
अपने कर्म के क्रम में ला खड़ा नहीं कर देती है?
कर्मरत आखिर है कौन?
क्या ये समय
या फिर ये प्रकृति
प्रकृति और समय
समय और प्रकृति..
कहीं ये दोनों ही तो नहीं..
-जो-
पूरे ब्रह्मांड के करोड़ों-करोड़ों
आकाशगंगाओं
एवं अरबों-खरबों पिंडों की
असीम उर्जाओं को समेटे हुए हैं
कहीं ये ही तो नहीं..
जिसमें हर पल बनने
एवं हर पल बिगड़ने की प्रक्रिया
निरंतर हो रही है
तो कर्मरत कौन?
हम, तुम, प्रकृति,
या फिर ये समय-
सतत्! बिल्कुल सतत्!!??